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Thursday, May 22, 2014

मैं

मैं
ना मैं दरिया हूँ, ना सागर, मैं बस दोनों का जज़्बा हूँ,
कभी हैरान हूँ खुद पे, कभी मैं सब समझता हूँ |

मुद्दत बाद इस दिल में कोई तूफान आया है,
कि थोड़ा तुम ठहर जाओ, और थोड़ा मैं ठहरता हूँ |

मेरी दुश्वारिओं को मैं कभी भी कह नहीं पाया,
बिना बोले समझ जाओ, कि जैसे मैं समझता हूँ |

Sunday, May 27, 2007

आँखें

जैसे रेगिस्तान में मृग-तृष्णा को देख कर दृष्टि-भ्रम होता है,
मेरे बुलाने पर उस बच्चे कि आंखों में कुछ ऐसी ही चमक थी।
मैंने उसे पास बुलाया,
बोला :
क्यों माँगते हो, क्यों नहीं पढने तुम जाते हो ?
क्या तुम्हें अच्छा लगता है, भीख-माँगना !
वोही आंखें, इस बार फिर उठीं,
पर घृणा और द्वेष से,
बोला साब, क्या पदायेंगे मुझे आप,
इस गरीब को दो वक़्त का भोजन दे पायेंगे आप,
भाषण दे दो, अपना क्या जाता है ?
उस भाषण को यथार्थ बनाने में दिल क्यों घबराता है !
सारे समर्थों का प्रतिनिधि मैं
शर्म से आंखें भी नहीं झुकीं,
वोही आंखें थी अब भी मुझ पर रुकीं,
मैंने जेब से एक सिक्का निकाला...... दिया,
और उस बच्चे कि आंखें एक नयी रौशनी को
ढूंढने को मुड़ गयी !


-आशुतोष

Monday, April 30, 2007

भारतीय युवा पीढ़ी !

आज का युवा

कालेज में आने के बाद, दिल में उठी ये आवाज़,
बेटा यहाँ से पढ़ के जाना है सारी दुनिया को कुछ कर दिखाना है,

इसी उधेड़बुन में पहुंचे हम क्लास में,
क्लास मई पढ़ाई कि बात जो कि शुरू, मिल गया हमें हमारा गुरू,
उसने हमें बुलाया, अपने पास बिठाया,
बोला: अभी नया नया आया लगता है,
तभी पढ़ाई कि बात करता है, क्या ज़िन्दगी से इतना डरता है,

मेरी शरण में आ जा तो कुछ बन जाएगा,
और एक क्लास में अगर दो-चार साल भी ना रहा,
तो कोर्स क्या ख़ाक समझ पायेगा,

सामने से आ रही थी एक सुन्दर कन्या,
उसने उसे बुलाया, मेरे पास बिठाया, और बोला:
इन्हें देख रहे हो ? ये हामारी मिस कालेज हैं,
और वो दूर जो दीवानों के हाथ में हो दीख रह है न
वो इनका ही लगेज है,

पूछो इनसे, की उनमें से किसके साथ इनकी लाइफ फीट हैं,
वो बोली, तू तो बड़ा स्तुपिद है,

अरे ! ये सब तो कालेज आने का एक बहाना है,
बन के दुल्हन एक दिन हमें, इनके घर थोड़े ही जाना है

सुन कर मैं हुआ हैरान,
कितना बदसूरत था सौंदर्य का यह ऐलान,
आज का युवा यह क्या सीख रहा हैं, उसे रूह का सौंदर्य क्यों नही दीख रहा है,
क्यों बिछा रहे हैं ये जज्बातों कि लाश, क्या हर रिश्ता ही हैं इनके लिए टाई म - पास,
तभी एक रोशनी ने आकर मुझे जगाया, मई ख्वाब से हक़ीकत में आया,
तब पता चला की ये सब एक सपना था, पर ना जाने क्यों आज भी ये लगता है,
की वो समाज जो मैंने सपने में देखा था, वो समाज मेरा अपना था,
मेरा अपना था,
मेरा अपना था

धर्म की राजनीति

आदमी

कभी राम के नाम पे जीता था आदमी, आज राम के नाम पे मरता है आदमी,
ये ख़ून कि नदियाँ जो बह रही हैं हर तरफ, उसमे राम नाम की नैया को खेता है आदमी।
एय इंसा तेरी इंसानियत को ये क्या है हो गया,
मासूमों को मार के तू करेगा मंदिर खड़ा,
नदानों के लाश पे डालेगा इसकी नीव,
अब्लाओं के ख़ून से जलायेगा इसके दीप,
मासूमों की चीत्कार से बजेंगी इसकी घंटियाँ,
हवान्कुंद में गिरेंगी सुहागनो कि बिंदियाँ,
उन बंदियों कि राख से करेगा जब तू तिलक,
इन्सान तो क्या उस राम की भी जायेंगी आंखें छलक,
तो क्यों उस राम कि आँखें छाल्काता है आदमी,
क्यों आदमी पे कहर बर्पता है आदमी,
और जब रहता है राम हर इन्सान में, हर दिल में,
तो ना जाने क्यों मंदिर बनवाता है आदमी,
ना जाने क्यों मंदिर बनवाता है आदमी,
ना जाने क्यों मंदिर बनवाता है आदमी !!!
- आशुतोष